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    सिर सांटे रुंख रहे तोई सस्तो जाण ; 363 लोगों ने पेड़ बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी

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    सिर सांटे रुंख रहे तोई सस्तो जाण ; 363 लोगों ने पेड़ बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी

    जब भी बात पर्यावरण संरक्षण की आती है तो सबसे पहले अमृता देवी विश्नोई का नाम याद आता है. 18 वीं सदी की बात है तब जोधपुर ( तत्माकालीन रवाड़ रियासत ) के राजा अभयसिंह थे. अभयसिंह, अजीत सिंह के पुत्र थे. अभयसिंह ने अपने भाई बखतसिंह के साथ मिलकर अपने पिता महाराजा अजीत सिंह की हत्या करवा दी थी.

    महाराजा अभयसिंह ने अपने लिए मेहरानगढ़ में नए महल निर्माण करने के लिए सैनिको को लकड़ी काटकर लाने का आदेश दिया. पूर्व में भवन निर्माण के लिए चूने का प्रयोग किया जाता था. महल निर्माण के लिए चूना पकाने के लिए लकड़ी की आवश्यकता पड़ी. जोधपुर के पास ही 30 किलोमीटर दूर खेजड़ली गाँव मारवाड़ रियासत का ही हिस्सा था.

    खेजड़ली गाँव में खेजड़ी के वृक्ष बहुतायत में थे. गाँव में विश्नोई समुदाय के लोगो का निवास था. मंगलवार का दिन था. राजा के सैनिक पेड़ो की कटाई के लिए खेजड़ली पहुँचे. अमृता देवी ने सैनिको द्वारा पेड़ काटे जाने का विरोध किया क्योंकि विश्नोई धर्म में पेड़ काटना मना है. किसी भी कीमत पर पेड़ो का काटा जाना मंजूर नहीं था. लेकिन विरोध के बावजूद भी सैनिको ने पेड़ो की कटाई शुरू कर दी.

    यह देखकर अमृता देवी पेड़ से चिपक गई और उन्होंने कहा कि “सिर सांटे रुंख रहे तोई सस्तो जाण” अर्थात् पेड़ो को बचाने के लिए सिर भी कटाना पड़े तो सस्ता सौदा है. सैनिको ने बिना हिचके पेड़ काटने का विरोध कर रही अमृता देवी पर भी कुल्हाड़ी चला दी. यह देखकर अमृता देवी की तीन बेटियाँ भी पेड़ से चिपक गई उन्हें भी सैनिको ने मार डाला. यह ख़बर गाँव में फैलते ही गाँव के अन्य लोग भी एक एक करके पेड़ो से चिपकते गए और सैनिक पेड़ से चिपके लोगों की जान लेते रहे. देखते ही देखते गाँव के 363 लोगों ने पेड़ बचाने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए.

    महाराजा अभयसिंह ने यह ख़बर सुनकर पेड़ो की कटाई रोकने का आदेश दिया. फिर बाद में राजा ने खेजड़ली गाँव जाकर जनता से इस कृत्य के लिए माफ़ी मांगी और वादा किया कि जिस भी गाँव में विश्नोई समुदाय के लोग रहेंगे वहां पेड़ नहीं काटे जायेंगे.

    अमृता देवी ने पेड़ की रक्षा के लिए सिर कटाना बेहतर समझा और पूरी दुनिया को पर्यावरण संरक्षण का सन्देश दिया जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है. अमृता देवी पर्यावरण के प्रति प्रेम और समर्पण का एक प्रतीक है. खेजड़ली आज पूरी दुनिया के लिए पर्यावरण संरक्षण के लिए एक मिसाल है.

    वर्तमान में राज्य सरकार अमृता देवी के नाम से पर्यावरण संरक्षण के लिए पुरुस्कार देती है. खेजड़ली का आन्दोलन राजस्थान में आज लोक आस्था का एक विषय बन चुका है. हर बरस खेजड़ली गाँव में इन शहीदों की याद में मेला भरता है. इस ऐतिहासिक आन्दोलन को मारवाड़ का चिपको आन्दोलन कहा भी जाता है.

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