जातीय कट्टरपन का समाज , जातीय कट्टरपन से बढ़ रही वैमन्यस्ता

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जातीय कट्टरपन का समाज , जातीय कट्टरपन से बढ़ रही वैमन्यस्ता

मनुष्यों ने अपने लिए समाज का निर्माण तो किया लेकिन फिर उसी समाज के माध्यम से ही सबने मिलकर अपने ही लोगो का समाज के नाम पर शोषण भी किया है. वर्तमान में समाज को आईना दिखाने वाले, समाज सुधारक बहुत ही कम है. बदकिस्मती से जो है उन्हें समाजविरोधी और देश विरोधी कह दिया जाता है. 

किसी से भी ये प्रश्न पूछा जाए कि समाज क्या है ? तो यही उत्तर मिलेगा कि फलाँ जाति या धर्म के लोगों का एक समूह ही समाज है. लेकिन मानवता के समाज की कोई बात नही करेगा. जाति का समाज एक मनुष्यताविहीन समाज है.

देखा जाए तो जितने भी समाज सुधारक हुए महात्मा फूले, पेरियार या फिर अम्बेडकर. सभी हमेशा एक जातिविहीन प्रगतिशील समाज का निर्माण करना चाहते थे. हमारे इन पूर्वजो ने जातीय भेदभाव मिटाने एंव वंचितों एंव गरीबो के लिए सम्मान की लडाई लड़ी लेकिन कट्टरपंथियों ने सदा ही उन्हें नीचा दिखाने और गलत साबित करने की कोशिश की है. असल में हमने समाज शब्द को ही महत्वहीन बना दिया है.

देश में धार्मिक की तरह ही सामाजिक तौर पर भी कट्टरपन फैला हुआ है. हर जाति या वर्ग  के लोग दूसरी जाति को नीचा दिखाने की कोशिश करते है. एक ही धर्म के लोग जो धर्म के नाम पर इक्कठा होकर लड़ते है लेकिन फिर वही लोग जाति के नाम पर आपस में भी लड़ रहे होते है. आज का युवा धर्म के साथ ही जाति के कट्टरपन के कीचड़ में धँसता जा रहा है और ऐसे किसी भी जाति के समाज में प्रेम के लिए आपको किसी कोने में जगह नही मिलेगी.

महज फूले, पेरियार या आम्बेडकर की जयंती पर उनकी मूर्ति पूजा करने मात्र से ही हमारे समाज की दिशा नही बदल जायेगी. इसके लिए उनके विचारों को भी अमल में लाना होगा. क्या आपने "सत्य शोधक समाज" का नाम सुना है ?  इन सब विचारों को हमने दफना दिया है.

हमने जातीय समाज में कभी कुरीतियो एंव बुराईयों का अंत करने के बारे में सोचा ही नहीं  है. असलियत यह है कि आज के दौर में हम सिर्फ समाज के नाम पर भवन निर्माण करते रह गये है और उस भवन में मनुष्यता और प्रेम के लिए कोई जगह नही है. 

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